Ghulam Ali: Awaargi barange-tamasha buri nahi

आवारगी ब-रंग-ए-तमाशा बुरी नहीं

Awaaragi ba-rang-e-tamaasha buri nahin;
Zauq-e-nazar mile to ye duniya buri nahin;

Kahate hain teri zulf-e-parishaan ko zindagi;
Ai dost zindagi ki tamanna buri nahin;

Hai naakhuda ka meri tabaahi se waasta;
Main jaanata hun niyat-e-dariya buri nahin;

Is rahazan-e-hayaat zamaane se dur chal;
Mar bhi gaye to chaadar-e-sahara buri nahin;

आवारगी ब-रंग-ए-तमाशा बुरी नहीं;
जोक-ए-नज़र मिले तो ये दुनिया बुरी नहीं;
कहते हैन्तेरी ज़ुल्फ़-ए-परीशां को जिंदगी;
ऐ दोस्त जिंदगी की तमन्ना बुरी नहीं;
है नाखुदा का मेरी तबाही से वास्ता;
मैं जानता हूँ नियति-ए-दरिया बुरी नहीं;
इस रहज़न-ए-हयात ज़माने से दूर चल;
मर भी गये तो चादर-ए-सहरा बुरी नहीं!

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